काश वो बचपन लौट आए ।

​काश वो बचपन लौट आए,

जब माँ की गोद ही थी सबकुछ,

पापा का कन्धा ही था  जन्नत।

होमवर्क कर लेना ही थी पढाई,

और शाम का खेल था चुप्पम छुपाई।
काश वो बचपन लौट आए,

जब जिद करना हमारा हक़ था,

और पूरी न होना हमारी मायूसि कारण।

जिसे दूर करने मे सब जूट जाते ।

अब न मायूसि के वो साधारण से कारण,

बल्कि अब मायूसि हे है साधारण ।
काश वो बचपन लौट आए,

जब हंसी बेफिक्री थी,

चेहरा जरा भोला था,

शरीर कुछ ज्यादा फुर्तीला था।
काश वो बचपन लौट आए,

जब चॉकलेट ही जरूरत थी,

खिलौनो की ही नुमाइश थी,

खेल भी अपना था ,और अंत भी ,

अब पता चला न खेल है अपना ,

न अंत है अपना।

काश वो बचपन लौट आए।

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